आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मेधा का विलाप !

                
                                                         
                            मेधा रोती बंद कमरों में अब तो शस्त्र उठाओ तुम,
                                                                 
                            
काग़ज़ के इन सौदागर को असली औक़ात दिखाओ तुम।
कमरे की उस बंद घुटन में जो रातों भर जागे थे,
सपनों को पूरा करने को जो सुख हमने त्यागे थे।

उन रातों की सूजी आँखें आज न्याय को रोती हैं,
मेहनत की पावन आहुतियाँ चंद रुपयों में बिकती हैं।
लाखों ख़्वाब यहाँ बिकते हैं सरेआम बाज़ारों में,
ईमान यहाँ पर सो रहा है महलों और मीनारों में।

नीलाम हो रही मेधा देखो पेपर लीक के धंधों से,
खेला जा रहा भविष्य यहाँ चंद स्वार्थी अंधों से।
सब मौन खड़े तमाशा देखते कोई नहीं बचाने को,
बैठे हैं व्यवस्था के दानव सपनों को खा जाने को।

अब जाग उठो ओ युवा देश के तुम हुंकार लगाओ अब,
इस अंधी बहरी व्यवस्था का तुम तख़्त हिलाओ अब।
अक्षरों में निज तेज़ भरो तुम खुद अपना इतिहास लिखो,
इस खोखले तंत्र की छाती पर क्रांति का नया प्रकाश लिखो
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर