मेधा रोती बंद कमरों में अब तो शस्त्र उठाओ तुम,
काग़ज़ के इन सौदागर को असली औक़ात दिखाओ तुम।
कमरे की उस बंद घुटन में जो रातों भर जागे थे,
सपनों को पूरा करने को जो सुख हमने त्यागे थे।
उन रातों की सूजी आँखें आज न्याय को रोती हैं,
मेहनत की पावन आहुतियाँ चंद रुपयों में बिकती हैं।
लाखों ख़्वाब यहाँ बिकते हैं सरेआम बाज़ारों में,
ईमान यहाँ पर सो रहा है महलों और मीनारों में।
नीलाम हो रही मेधा देखो पेपर लीक के धंधों से,
खेला जा रहा भविष्य यहाँ चंद स्वार्थी अंधों से।
सब मौन खड़े तमाशा देखते कोई नहीं बचाने को,
बैठे हैं व्यवस्था के दानव सपनों को खा जाने को।
अब जाग उठो ओ युवा देश के तुम हुंकार लगाओ अब,
इस अंधी बहरी व्यवस्था का तुम तख़्त हिलाओ अब।
अक्षरों में निज तेज़ भरो तुम खुद अपना इतिहास लिखो,
इस खोखले तंत्र की छाती पर क्रांति का नया प्रकाश लिखो
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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