जो खुद को समझती हैं समझदारी का आईना यहाँ,
दूसरों को सिखाती हैं कि बोलना कैसे है कहाँ।
पर भूल जाती हैं कि उनके खुद के दामन धूल हैं,
दूसरों पर उँगलियाँ उठाना तो बस उनकी भूल है।
ज़ुबां की अक्ल का वो जो देती हैं हमें ये ज्ञान,
ज़रा झाँक कर देखें तो खो चुकी हैं अपनी पहचान।
दिखावे का ओढ़ कर दुपट्टा घूमती हैं शहर में,
पर ज़हर घुला हुआ है उनकी हर एक नज़र में।
ऊपर से मीठी बातें और अंदर कपट का समंदर है,
जो सीधे मुँह बात न करे, वही छुपा उनके अंदर है।
दूसरों के लहजे पर जो आज कस रही हैं कसौटियाँ,
असल में खुद ही चबा रही हैं वो झूठ की रोटियाँ।
बड़ा गुमान है उन्हें अपनी खोखली इस साख पर,
पर सच तो यह है कि बैठी हैं वो बारूद की राख पर।
तमीज़ का सलीका सिखाना बस उनका एक बहाना है,
अपनी खुद की कमियों को दुनिया से जो छुपाना है।
चरित्र की दुहाई देकर जो बनती हैं बहुत महान,
उनकी नीयत का बाज़ार में हो चुका है सरेआम ऐलान।पीठ पीछे वार करना तो उनका पुराना दस्तूर है,
दूसरों को नीचा दिखाकर मिलता उन्हें सुरूर है।
जो अपनी ही नज़रों में गिरकर हो चुकी हैं तार-तार,
वो चली हैं आज करने दूसरों के लहजे पर वार।
पर याद रखें कि मुखौटे एक दिन उतर ही जाते हैं,
जो दूसरों को डसते हैं, वो खुद ही अकेले रह जाते हैं।अब समझ आ गया है हमें उनके इस पाखंड का खेल,
दिखावे की समझदारी का नहीं होता कोई मेल।
चुप रहकर हमने भी उनकी हर चाल को है जान लिया,
उनके खोखले वजूद का असली चेहरा पहचान लिया।
अब देने दो उन्हें ज्ञान, हमें कोई परवाह नहीं,
क्योंकि उनकी नफ़रत की अब दिल में कोई राह नहीं।
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