सोया है क्यों आज देश का, प्रखर चेतना का मानस।
भूल गया क्यों अपनी ताकत, ऋषियों का पावन सारस॥
फैल रहा जो तिमिर दसों दिश, उसको मिलकर दूर करो।
सत्य, न्याय की मशाल लेकर, हर पाखंड को चूर करो॥
रिश्तों की मर्यादा टूटे, मौन खड़ी है क्यों जनता।
स्वार्थ-अंधे इस कोलाहल में, खोई क्यों पावन समता॥
लेखनी अब हुंकार भरेगी, नया सवेरा लाना है।
सोए हुए समाज को अब तो, गीत नया ही गाना है॥
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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