जो अज्ञान के काले अंधेरों को मिटाते हैं,
जो भटके हुए राही को रस्ता दिखाते हैं।
विधाता ने तो केवल सांस का पुतला बुना था पर,
मगर इंसान को इंसान तो शिक्षक बनाते हैं।
कभी माता की ममता सा अनोखा प्यार देते हैं,
कभी गुरु-ज्ञान की पावन सुरीली धार देते हैं।
अकेलेपन के सन्नाटे में जो थमने नहीं देती,
हमारी उस तड़प को वो नया आकार देते हैं।
किताबी ज्ञान के संग-संग, सामाजिक ज्ञान देते हैं,
हमें काबिल बनाते हैं, हमें पहचान देते हैं।
भटक जाते हैं जब हम ज़िंदगी के तंग रास्तों पर,
हमें इस दौर में जीने का, एक वरदान देते हैं।
मज़बूती हमारे हौसलों को रोज़ देते हैं,
अँधेरी मंजिलों में रोशनी की खोज देते हैं।
किताबों के पन्नों से निकलकर ज़िंदगी जीना,
बड़ी आसानी से वो रोज़ ये संदेश देते हैं।
कोई ओहदा बड़ा हो या सिकंदर कोई महफ़िल का,
झुकेगा शीश चरणों में हमेशा साफ़ इक दिल का।
आप ने ख़्वाब बुन्ना और सच करना सिखाया है,
सफ़र आसान होता है मिला जो साथ मंज़िल का।
करूँ नमन आपके ज्ञान को, ये शीश झुकता है,
आपकी प्रेरणा से ही मेरा हर ख़्वाब सजता है।
रहूँगा उम्र भर मैं कर्ज़दार आपकी शिक्षा का,
कि जिससे आज मेरे अंतस में कोई दीप जलता है।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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