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अनकहा दर्द :- ज़ख़्म-ए-हयात

                
                                                         
                            जलते हैं रोज़ दीप यहाँ इस मज़ार में
                                                                 
                            
रोता है कोई बैठ के तन्हा मज़ार में

जितने मिले हैं ज़ख़्म मुझे इस हयात से
उतने ही अश्क बह गए इस इन्तिज़ार में

हर एक मोड़ पर मिली रुसवाइयाँ यहाँ
खोया हुआ है हर कोई इस ही ग़ुबार में।

कलियाँ जो खिल सकीं न कभी इस चमन के बीच
बिखरी हैं आज देख लो वो ख़ार-ज़ार में

आती नहीं है लौट के गुज़री हुई बहार
रोता है दिल सुकूँ के लिए इस बयार में

अमज़द जो कह सका न कभी अपने दिल की बात
वो राज़ सो गया है इसी सोगवार में
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर' 
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3 महीने पहले

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