अदालत मौन है, और सच यहाँ ज़िंदा जलाया जाता है,
हुकूमत के इशारों पर तमाशा रोज़ नया रचाया जाता है।अजीब दौर है कि भूखे पेट को अब कोई रोटियाँ नहीं देता,
मगर मज़हब के नाम पर हर रोज़ ख़ून बहाया जाता है।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
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