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आँगन की कली

                
                                                         
                            जो कभी कागज़ की नावें बनाती थी,
                                                                 
                            
आज वो जीवन के हर तूफ़ान को हराती है।
रात को जो परियों की कहानी सुनकर मुसकुराती थी,
आज वो हक़ीक़त के हर फ़ैसले ख़ुद सुलझाती है।
गुल्लक के सिक्कों को जो अपनी जागीर बताती थी,
आज वो मेहनत के दम पर अपना मुक़ाम बनाती है।
ज़रा सी डांट पर जो माँ के आँचल में छुप जाती थी,
आज वो पूरे परिवार को अपनी ममता की छाँव दिलाती है।
घटनों के बल चलकर जो सारे घर को सजाती थी,
आज वो कामयाबी के ऊँचे शिखरों पर कदम बढ़ाती है।
छोटी सी उलझन में जो अक्सर घबरा जाती थी,
आज वो गंभीर मसलों पर भी अपनी राय जताती है।
जो अपनी हर एक ज़िद हमसे हँसकर मनवाती थी,
आज वो बुढ़ापे में हमारा सबसे मज़बूत सहारा बन जाती है।
प्यारी बेटी जो आँखों को अभी भी छोटी सी नज़र आती है,
वो नन्हीं परी अब सचमुच संसार को संभालना सीख जाती है।
— रोहित शर्मा भारद्वाज
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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