कुछ किताबों को पढ़ कर जाने क्या हुआ,
बड़ा धुँधला सा मौसम है जाने क्या हुआ।
बड़ी दहशत थी, मैं तुम्हे खो दूं न कहीं,
तुम्हारे यूं चले जाना अच्छा ही हुआ।
कोई एक ख्वाब नहीं मुझमे तुम्हारा,
तुम्हारा काजल ही ख़्वाब मेरा हुआ।
अंधेरा था तो जुगनू मैं चुराना चाहता कभी,
चलो अब दिन निकल आया अच्छा ही हुआ।
तुम्हारी रहगुज़र में बंजारा बन गया,
हमारी चाहतों का वो सफ़र पूरा न हुआ।
अबकी मिलना तो ऐसे मिलना ध्रुव,
जिस तरह हमारा आख़िरी मिलना हुआ।
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