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राजनीति के प्रणब दा

                
                                                         
                            बंगाल के छोटे गांव से निकल कर।
                                                                 
                            
जिसने देश को राजनीति का पाठ पढ़ाया।।
आज अकेला छोड़ के सबको उसने।
अपने अंतिम मार्ग पे कदम बढ़ाया।

आज़ादी के दौड़ को जिसने।
अपनी आंखों से था देखा।
नव भारत के निर्माण में उसने।
अपना अहम योगदान निभाया।

कांग्रेस की नींव पे जिसने।
अपने नाम का दीवार बनाया।
जब लड़खड़ा रही थी एक मोड़ पे पार्टी।
तब अपनी सूझ बूझ से नया मुकाम दिलाया।

देश सेवा में संलग्न रहे ये सदा।
अपनी जिम्मेदारी को खूब निभाया।
पाँच दशक देखे राजनीति में जिसने।
अपने दायित्व को भलीभांति निभाया।

पक्ष विपक्ष जो भी हो चाहे।
हर किसी ने इनको खूब सराहा।
मार्गदर्शक बन खड़े रहे राजनीति में।
तभी तो सभी ने प्रणब दा कह के पुकारा।

राष्ट्रपति बन राष्ट्र के अपने।
प्रथम भारतीय का अधिकार था पाया।
भारत रत्न पास था इनके।
अपनी प्रतिभा का सदैव परचम लहराया।


-- रितेश तिवारी


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5 वर्ष पहले

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