आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

पथप्रदर्शक कर्तव्य

                
                                                         
                            बंध गया हो जब स्वप्न में जीवन,
                                                                 
                            
हो रहा हो जब भयभीत ये मन,
हो जब सात्त्विकता का अधर्म से मिलन,
हो रहा हो जब संघर्ष का निधन,
तब तू मेरा पथप्रदर्शक बन दिखाना,
हे कर्तव्य हर क्षण मुझे तू स्मरण आना।

हो जहां सत्य का प्रतीक ये गगन,
गा रही हो जहां ये प्रकृति धर्म का भजन,
हो जहां कर्म ही सर्वश्रेष्ठता का धन,
हो रहा हो जहां बुद्धि का ज्ञान से लगन,
ऐसे ही पथ से तू मेरा मार्गदर्शन करना,
हे कर्तव्य हर क्षण मुझे तू स्मरण आना।

हो जिनसे निर्मित नव युग का तन,
निकले जिनसे अंकुर बन नव-जीवन,
हो जिनसे दिप्ति सूर्य के आलोक सा मानव-पन,
जो निकले ज्ञान का, विज्ञान का, मानवता का प्रतीक बन,
ऐसे सत्पुरूष से तू मेरा मार्गदर्शक बन मिलाना,
हे कर्तव्य हर क्षण मुझे तू स्मरण आना।
 
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करे।
4 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर