आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मैं राणा उसकी अभिलाषा हूँ

                
                                                         
                            है मृत्यु आज अंकिंचित,
                                                                 
                            
मैं राणा उसकी अभिलाषा हूँ,
वह आश लगाए पीछे मेरे,
मैं मुगलों के खून का प्यासा हूँ।

लोहू लोहित भाल, भुजा –
सज्जित रण हुंकारों से,
राजपूती शान बनी निर्झर, गिरि,
मुगल दुबकते हथियारों से,

हे मातृ धरित्री, पौरुष को–
प्रतिदिन पौढ़ बनाने वाली,
चल खेलें होली ले खप्पर,
हम बालक, तूं माँ काली,

माँ, कब केहरि ने श्वानों के झुंड पर,
मुख अपना फेरा है?
पर श्वानों की हिम्मत देखो,
आ केहरि को घेरा है,

तो आज बजेगी रणभेरी,
एक एक शत्रु मारा जाएगा,
अकबर का नाम लिखें इतिहासी,
राणा को शौर्य सुनाएगा,

जग बतलाएंगे तुझको, कैसे?
पलते हैं वीर पसीने से,
छाती की दृढ़ता सम्मुख तेरे,
तू चाहे तोप लगा दे सीने से,

मेवाड़ नहीं भू खण्ड केवल,
नर–नर शक्ति का बाना है,
पोषण ही बलिदान यहां है,
यह जग जिसका दीवाना है,

मेवाड़ जीतने का अकबर को,
मैं राणा कुलिश निराशा हूँ,
वह आश लगाए पीछे मेरे,
मैं मुगलों के खून का प्यासा हूँ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर