है मृत्यु आज अंकिंचित,
मैं राणा उसकी अभिलाषा हूँ,
वह आश लगाए पीछे मेरे,
मैं मुगलों के खून का प्यासा हूँ।
लोहू लोहित भाल, भुजा –
सज्जित रण हुंकारों से,
राजपूती शान बनी निर्झर, गिरि,
मुगल दुबकते हथियारों से,
हे मातृ धरित्री, पौरुष को–
प्रतिदिन पौढ़ बनाने वाली,
चल खेलें होली ले खप्पर,
हम बालक, तूं माँ काली,
माँ, कब केहरि ने श्वानों के झुंड पर,
मुख अपना फेरा है?
पर श्वानों की हिम्मत देखो,
आ केहरि को घेरा है,
तो आज बजेगी रणभेरी,
एक एक शत्रु मारा जाएगा,
अकबर का नाम लिखें इतिहासी,
राणा को शौर्य सुनाएगा,
जग बतलाएंगे तुझको, कैसे?
पलते हैं वीर पसीने से,
छाती की दृढ़ता सम्मुख तेरे,
तू चाहे तोप लगा दे सीने से,
मेवाड़ नहीं भू खण्ड केवल,
नर–नर शक्ति का बाना है,
पोषण ही बलिदान यहां है,
यह जग जिसका दीवाना है,
मेवाड़ जीतने का अकबर को,
मैं राणा कुलिश निराशा हूँ,
वह आश लगाए पीछे मेरे,
मैं मुगलों के खून का प्यासा हूँ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X