उसने माना ही नहीं, उसके जाने से–
मेरी ज़िंदगानी खत्म हो गई,
उनको जिंदगी बनाने की तमन्ना थी,
चार दिन में कहानी खत्म हो गई,
ख़्याल आया ही नहीं कुछ इतने मशगूल हो गए,
गिर कांच के दिलासे ज़मीं पर चूर हो गए,
आज परिंदों सा पिंजरे में फड़फड़ाता हूँ,
खामोशियों में आवाज़ दे मैं उसको चीखकर बुलाता हूँ,
मेरी हालत पे रहम खाकर,
वो शायद आ जाए तस्वीर से निकल,
होश घूमने का गुरूर मुझमें,
पागलों सा है आजकल,
नहाते हुए भी पसीने में भीग जाता हूँ,
मैं उसकी आग दिल में इतनी जलता हूँ,
एक आखरी बची थी दर्द मुझमें,
अब ये भी निशानी खत्म हो गई,
उनको जिंदगी बनाने की तमन्ना थी,
चार दिन में कहानी खत्म हो गई।
– ऋषभ भट्ट
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