आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

चार दिन में कहानी खत्म हो गई

                
                                                         
                            उसने माना ही नहीं, उसके जाने से–
                                                                 
                            
मेरी ज़िंदगानी खत्म हो गई,
उनको जिंदगी बनाने की तमन्ना थी,
चार दिन में कहानी खत्म हो गई,

ख़्याल आया ही नहीं कुछ इतने मशगूल हो गए,
गिर कांच के दिलासे ज़मीं पर चूर हो गए,
आज परिंदों सा पिंजरे में फड़फड़ाता हूँ,
खामोशियों में आवाज़ दे मैं उसको चीखकर बुलाता हूँ,

मेरी हालत पे रहम खाकर,
वो शायद आ जाए तस्वीर से निकल,
होश घूमने का गुरूर मुझमें,
पागलों सा है आजकल,

नहाते हुए भी पसीने में भीग जाता हूँ,
मैं उसकी आग दिल में इतनी जलता हूँ,
एक आखरी बची थी दर्द मुझमें,
अब ये भी निशानी खत्म हो गई,

उनको जिंदगी बनाने की तमन्ना थी,
चार दिन में कहानी खत्म हो गई।
– ऋषभ भट्ट
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर