आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बंधन मुक्ति

                
                                                         
                            कर जीवन परिणीत
                                                                 
                            
हो सर्वस्व त्याग युक्त,
राग द्वेश मित्र शत्रु,
मिथ्या जड़ बंधन से मुक्ति।

चक्रव्यूह मोह का
उत्पीड़न का है राज्य,
ज्ञान का व्याधान,
करे नीरवता भाज्य।

गतिरोधक अनुभव रस का
सम्मोहन कारी हाला जो,
नहि औषधि रोग की
प्रेम शूल की माला वो।

पावक है रूप सी
प्रज्ञा का ये काल,
उत्कर्ष का अंकुश ये
भ्रान्ति सम्मोहन जाल।

सहचर एक विवेक
बैरी सा ये विश्वानर,
बन अन्तर्पथ निर्देशक
संसृति कारा स्वाहा कर।

तज माया सर्व
सत्य अंत उत्पत्ति का,
अमर आत्मा,बोध कर-
जीवनसुधा सम्पत्ति का।
 
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करे।
4 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर