कर जीवन परिणीत
हो सर्वस्व त्याग युक्त,
राग द्वेश मित्र शत्रु,
मिथ्या जड़ बंधन से मुक्ति।
चक्रव्यूह मोह का
उत्पीड़न का है राज्य,
ज्ञान का व्याधान,
करे नीरवता भाज्य।
गतिरोधक अनुभव रस का
सम्मोहन कारी हाला जो,
नहि औषधि रोग की
प्रेम शूल की माला वो।
पावक है रूप सी
प्रज्ञा का ये काल,
उत्कर्ष का अंकुश ये
भ्रान्ति सम्मोहन जाल।
सहचर एक विवेक
बैरी सा ये विश्वानर,
बन अन्तर्पथ निर्देशक
संसृति कारा स्वाहा कर।
तज माया सर्व
सत्य अंत उत्पत्ति का,
अमर आत्मा,बोध कर-
जीवनसुधा सम्पत्ति का।
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