दिल, तुझे माँ पुकार रहा
बीत गए बरसों, वह दिन जब बाबूजी हम सब से दूर हुए,
साथ छोड़कर चले गए, वो हम सबको तन्हा छोड़ गए।
पर माँ ने हम सबको ऐसे प्यार दिया, मानो कहीं कुछ कमी ही न हुआ।
माँ के साथ हम सबने जीना सीखा, गम हम सबसे कोसों दूर हुआ।
पर ईश्वर ने हम सबको आज ऐसे अनाथ बना दिया,
न हँसते हैं, न रोते हैं, मानो सब कुछ हमसे छीन गया।
माँ हम सबको छोड़कर चली गई,
न जाने हम सबसे दूर वो कहाँ गईं।
हम सबको रोता छोड़ गईं,
हम सबसे नाता तोड़ गईं।
यादों के धागों में बाँध गईं,
दुनिया की सीमा लाँघ गईं।
घर को सूना बना गईं,
हम सबको तन्हा बना गईं।
लाख पुकारा, पर न सुनी।
न जाने छोड़कर कहाँ गईं।
माँ, तड़प रही हूँ तुझसे मिलने को,
याद तुम्हारी सता रही है।
राह देख रही हूँ तेरे आने की,
नयना अश्रु बहा रही है।
एक बार तू आ जा माँ,मुझको गले लेना।
साथ मुझे तू ले चल माँ,तेरे बिन नहीं है अब जीना।
इस दुनिया में सब कुछ मिलता,माँ, सब रिश्ते हैं भरे पड़े।
पर तुझ-सा यहाँ कोई नहीं, माँ।मैं रो रही हूँ यहाँ अकेले पड़े-पड़े।
तेरी यादों के धागे, मेरे आँसू के मोती,
मिलकर तड़पाते हैं मुझको,
चैन नहीं है अब होती।
हर पल, हर क्षण, तेरी याद में दिल रोया करता है।
जीना है अब सिर्फ तेरी याद में,दिल नहीं यह समझता है।
तेरी गोद में सोने को,तेरी आवाज़ें सुनने को,
तेरे गले से लगने को,माँ, यह दिल है तड़प रहा।
कहाँ तुझे मैं ढूँढूँ माँ?
कहाँ तुझे मैं पाऊँ माँ?
कहाँ तुझे मैं देखूँ माँ?
अब नहीं है दिल संभल रहा।
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