अजेय है, जो चल पड़ा
कर्तव्य पथ पर है खड़ा
ना रुका, ना मुड़ा है लड़ा जो
ज्वलित दीप से जो प्रज्वलित करे मशाल
शूल हों चुभे, अड़े हों पहाड़
ना डरे ना थके,
वही है अजेय, वही है अजेय
सुनता रहा रौशनी की पुकार
अंधीयारे में भी करता रहा प्रहार
भेद गया पराजय का रूप विकराल
आशा की एक किरण लिए
लिखता रहा अमर -गाथा
वही है अजेय, वही है अजेय
दीप कभी ना बुझने पाएं
अधियां चाहे लाख आएं
रुके ना कभी कदम चाहे कितनी ही
पथरली हो डगर
टूटे हुए हौंसले को जोड़कर
जो फिर से चल सके
वही है अजेय, वही है अजेय ||
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