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सुधियों में बहक गई रंग भरी शाम

                
                                                         
                            सुधियों में बहक गई रंग भरी शाम
                                                                 
                            

परिभाषाओं, आदेशों
से घिरा हर क्षण
समीक्षायें जीवन की
करता हुआ मन
चाहता है भूल जाना अनुभूतियां तमाम

बिखरी आकांक्षायें
जर्जर सा तन
थका मस्तिष्क
रोगी सा मन
यही तो उपहार हैं नई सभ्यता के हमारे नाम

वर्तमान से व्यथित
भूत से परेशान
भविष्य से सहमा सा
हर हृदय अनजान
चाहता है लगा देना सभी पर विराम

-रवीन्द्र गर्ग

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6 वर्ष पहले

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