सुधियों में बहक गई रंग भरी शाम
परिभाषाओं, आदेशों
से घिरा हर क्षण
समीक्षायें जीवन की
करता हुआ मन
चाहता है भूल जाना अनुभूतियां तमाम
बिखरी आकांक्षायें
जर्जर सा तन
थका मस्तिष्क
रोगी सा मन
यही तो उपहार हैं नई सभ्यता के हमारे नाम
वर्तमान से व्यथित
भूत से परेशान
भविष्य से सहमा सा
हर हृदय अनजान
चाहता है लगा देना सभी पर विराम
-रवीन्द्र गर्ग
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X