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अधूरा इश्क़

                
                                                         
                            मेरे हर शब्द में थे तुम,अब हर शब्द है व्यर्थ हैं मेरे
                                                                 
                            
मेरे हर एहसास में थे तुम,अब एहसास न रहे मेरे

मेरे हर नक्श में थे तुम, अब सुना है जहाँ मेरा
मेरी हर बात में दिखती थी तुम्हारी ही परछाई,पर अब अंधेरा हो गया

पहली बार एक नम्बर याद हुआ था मुझे,अब खुद को भी भुला बैठा हूँ मै
मेरी हर मुस्कान में थे तुम,अब उदास रहता हूं मैं

आजाद पंछी सा उड़ने दिया तुम्हें, पिंजरा देख घबराता हूं मैं
आंख बंद करके चलता था संग तुम्हारे,आंख खोल कर चलने से डरता हूँ मैं

हर जर्रे में तुम्हे देखता था मैं, हर कतरे से घबरा जाने लगा हूं मैं
जब पूछती है दुनिया कहा हैं हमसफ़र तेरा,चुपचाप हो जाता हूं मैं   


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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