मेरी तन्हाई को आवाज़ का मौसम दे दे,
मेरी ख़ामोशियों में अपना भी कुछ ज़िक्र कर दे।
मैंने माँगा है तुझसे कोई सितारा न कभी,
मेरी मुट्ठी में बस एक वही सूखा गुलाब रख दे।
मेरी साँसों में बसा दे तू महक सावन की,
मेरी राहों में कोई फूल का गुच्छा न रख दे।
मैं भटकता हूँ बहुत दूर तलक तेरे ख़्वाब लिए,
मेरी आँखों में तू मंज़िल का भी मंज़र रख दे।
मैं अगर रेत हूँ, दरिया मुझे छूकर देखे,
मेरे सीने में भी, लहरों का समंदर रख दे।
तेरी यादों से उजाला है अभी तक दिल में,
एक जुगनू ही सही, रात के ख्वाबों में तू आज रख दे।
-रतन कुमार कैथवास
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