सृजन कैसे करूँ नई कविता का,
जिसमें आवेग हो, संदेश हो,
शब्दों में थोड़ी हलचल हो,
और मौन में भी परिवेश हो।
उसमें कलरव भी सुनाई दे,
और बाँसुरी का संगीत रहे,
आँखों में अनुराग ठहरा हो,
होंठों पर अपनापन प्रीत रहे।
जो घर आए, अतिथि-सा आए,
जो जाए, अपना कुछ प्यार दे जाए,
जिसके आँगन में द्वार न हों,
हर मन को अपना घर मिल जाए।
उसमें समरसता ऐसी हो,
जैसे सरिता में धार मिले,
मंदिर-मस्जिद, खेत-खलिहान,
सबको अपना संसार मिले।
कौतूहल की एक किरण हो,
हर पंक्ति में प्रश्न जगे मन में,
पढ़ने वाला रुककर सोचे,
फिर अपने भीतर उत्तर खोजे।
करुणा हो तो ऐसी हो कि,
पत्थर भी पानी हो जाए,
किसी अकेले मन की आहट,
शब्दों में आकर सो जाए।
अनजाना-पन भी थोड़ा हो,
हर बात खुली न रह जाए,
कुछ रहस्य बचा हो ऐसा,
पाठक फिर लौटकर आए।
आवेग रहे मगर उच्छृंखल नहीं,
शब्दों को बहने न दूँ मैं,
संदेश रहे मगर उपदेशों,
का बोझ न सहने दूँ मैं।
गीत रहे तो जीवन गाए,
दर्द रहे तो सच कह जाए,
हँसी मिले तो फूल खिला दे,
आँसू आए तो मन सहलाए।
काफ़िया केवल तुक न बने,
भावों का भी मेल रहे,
शब्द भले मेरे हों लेकिन,
हर पाठक का मेल रहे।
मैं कविता ऐसी लिखना चाहूँ,
जिसमें ‘मैं’ कम, ‘हम’ ज्यादा हो,
जिसे पढ़े तो लगे किसी ने,
मन के भीतर दीप जलाया हो।
जिसमें गाँव की मिट्टी बोले,
शहर की धड़कन साथ चले,
बूढ़ी आँखों की चुप्पी भी हो,
बच्चे के सपने साथ पले।
न उसमें केवल क्रोध रहे,
न केवल करुण पुकार रहे,
जीवन के सारे स्थिर भावों में,
एक सहज-सा विस्तार रहे।
तब शायद कविता जन्मेगी…
जब शब्द नहीं, संसार लिखूँ,
अपने मन की बात न केवल,
सबके मन का प्यार लिखूँ।
तब कविता केवल कविता नहीं,
चलता-फिरता संवाद बने,
जिसके हर शब्द में मनुष्य रहे,
और हर पाठक उसमें अपना नाम पढ़े।
- रतन कुमार कैथवास
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