गाँव के कुएँ की जगत पे, आधे कच्चे आधे पक्के,
अधलेटे हम बातें करते, दिन के किस्से बड़े चटखारे।
धूप ढली तो शाम ने आकर, धीरे से दस्तक दे डाली,
बातों-बातों में याद आ गई, चाय की प्याली मतवाली।
किस्से अपने खेत-खलिहानों के, कुछ बचपन की शरारत,
कुछ रिश्तों की मीठी बातें, कुछ अपनों की शिकायत।
वक़्त कहाँ था देखने का, घड़ी की सुई कहाँ जाती,
गाँव की उस ठंडी छाँव में, हर चिंता पीछे रह जाती।
चाय की तलब ने आख़िर में, अपना रंग दिखाया,
एक ने उठकर दूसरे को, टपरी का रस्ता सुझाया।
चौराहे पर रामफल की दुकान, धुएँ का था दरबार,
कुल्हड़ वाली चाय की ख़ुशबू, खींच रही थी बार-बार।
रामफल ने मुस्काकर पूछा, आज कहाँ की तैयारी,
हमने कहा, चाय पिला दे, बाकी बातें हैं हमारी।
उबलती चाय की केतली में, जैसे यादें खौल रही थीं,
अदरक वाली चुस्की के संग, दिल की गाँठें खुल रही थीं।
ना महलों की चाह रही थी, ना दौलत का अभिमान,
कुएँ की जगत, यार का साथ, चाय और गाँव की शान।
शहरों में लाखों महफ़िल हों, फिर भी वो बात कहाँ,
रामफल की उस टपरी जैसा, मिलता सुकून कहाँ।
-रतन कुमार कैथवास
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