जब समंदर साहिल पे दम दिखाए,
तुम हमें खूब याद आये,
चाँद जब बदली में छिप जाए,
तुम हमें खूब याद आये।
जब हवाएँ खिड़की से गुज़रें,
बालों को आकर सहलाएँ,
सूने कमरे में तेरी खुशबू
सहमकर धीरे-धीरे आए,
तुम हमें खूब याद आये।
जब बारिश की बूँदें छत पर,
कोई भूली धुन दोहराएँ,
भीगी मिट्टी की उस खुशबू में,
तेरे कदमों के निशान दिख जाए,
तुम हमें खूब याद आये।
जब शाम नदी के तट पर बैठी,
सूरज को धीरे धीरे समझाए,
डूबते सूरज की लाली में,
तेरा चेहरा नज़र आए,
तुम हमें खूब याद आये।
जब कोई पंछी दूर गगन में,
अपने घर को लौटता जाए,
उसकी आँखों की बेचैनी में,
तेरा इंतज़ार नज़र आए,
तुम हमें खूब याद आये।
जब कोई पुरानी ग़ज़ल अचानक,
बीते मौसम फिर ले आए,
हर मिसरे में तेरी आहट हो,
हर काफ़िया तुझ तक पहुँचाए,
तुम हमें खूब याद आये।
जब रात बहुत लंबी हो जाए,
नींद आँखों से रूठी जाए,
तकिए पर सिर रखते ही फिर,
यादों की महफ़िल सज जाए,
तुम हमें खूब याद आये।
जब खुशियों में भी कोई खाली,
कोना अपना नाम बताए,
भीड़ बहुत हो चारों ओर मगर,
मन तन्हा-तन्हा हो जाए,
तुम हमें खूब याद आये।
और जब खुद से बात करें हम,
मन कोई पुराना राज़ बताए,
जिसे भुलाने की कोशिश में
हर बार वही याद आए…
तुम हमें खूब याद आये।
- रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X