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थोड़ी सी बरसात चाहिए

                
                                                         
                            सूरज की धमनी में क्यों रक्त-सलिल बहता है,
                                                                 
                            
अंगारों के कारण क्यों इतना खौलता रहता है।

आकाश से इसको थोड़ी ठंडी ओस चाहिए,
जलते हुए सीने को कोई मधुर साँस चाहिए।

हर रोज़ तपिश ओढ़ के चलता है अकेला,
इस आग के दरिया को भी इक ठंडी प्यास चाहिए।

बादल की हथेली से ज़रा बूँदें उतरें तो,
इस धधकते हुए मौसम को नई आस चाहिए।

जो रोशनी बाँटता है दुनिया के अँधेरों में,
उस सूरज को भी शायद कोई पास चाहिए।

जलना ही अगर उसकी नियति है तो जलने दो,
पर राख न हो जाए… उसे थोड़ी-सी बरसात चाहिए।

अंगार बहुत हैं उसके भीतर मगर फिर भी,
जीने के लिए उसको, अपनों की एक ठंडी उच्छवास चाहिए।
-रतन कुमार कैथवास
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एक घंटा पहले

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