तेरे बग़ैर एक भी रदीफ़ हासिल न हुआ हमको,
कैसे उनकी आँखों से कोई ख़्वाब हासिल करें हम।
तेरी यादों के सिवा कुछ भी तो अपना नहीं रहा,
अब किसी और से कैसे कोई जवाब हासिल करें हम।
जिसके होने से मुकम्मल थी मेरी हर एक ग़ज़ल,
उसके बिन किस तरह कोई नया चैप्टर हासिल करें हम।
तू ही था तो मेरी रातों में चाँदनी रहती थी,
अब अँधेरे से भला कैसे आफ़ताब हासिल करें हम।
-रतन कुमार कैथवास
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