मौसम की खींचातानी में,
आँखों से नीर बहा दे क्या,
पुरवाई ने दगा दिया अब,
सावन की बरसातों में,
मन फिर तेरा पता बता दे क्या।
बादल घिरकर चुप बैठे हैं,
बिजली भी कुछ कहती है,
सूखी धरती की प्यास मगर,
हर बूँद में कुछ रहती है,
ये बादल यूँ ही बरसे हैं या,
तेरी खबर सुना दे क्या।
आँगन में तुलसी भीगी है,
छत पर बूँदें गाती हैं,
कच्ची गलियों की मिट्टी से,
बचपन की यादें आती हैं,
भीगे मौसम की ओट में फिर,
कोई अपना गीत सुना दे क्या।
पुरवाई जब छूकर गुज़री,
तेरी खुशबू लाई थी,
बंद पड़ी उस खिड़की ने भी,
जाने कैसी बात बताई थी,
हवा ने सच में छुआ था तुमको,
या मेरा भ्रम जगा दे क्या।
कागज़ पर कुछ शब्द पड़े हैं,
स्याही भी घबराती है,
तेरा नाम लिखूँ तो जाने,
क्यों आँख मेरी भर आती है,
इस सावन की एक बूँद से,
सारी कहानी कहला दे क्या।
दूर कहीं मंदिर की घंटी,
पास कहीं पायल छनकी,
मन ने जाने किस आहट पर,
तेरी राह अचानक देख ली,
सन्नाटे की इस महफ़िल में,
कोई आकर बोल दिया क्या।
सावन केवल पानी तो नहीं,
कुछ मन की भी बरसात है,
जिसे भुलाया वर्षों पहले,
आज वही फिर साथ है,
मौसम से क्या पूछें हम अब…
दिल ही अपना हाल बता दे क्या।
चलो आज इस भीगे मौसम में,
कोई शिकायत रहने दें,
तुम अपनी चुप्पी लेकर आना,
आँखों को अपनी बातें कहने दें,
दो कप चाय, खुली खिड़की हो…
सावन में फिर से प्यार जगा दे क्या।
- रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X