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संजीवनी कहाँ मिलेगी

                
                                                         
                            इस युग में संजीवनी कहाँ मिलेगी,
                                                                 
                            
किस पर्वत की चोटी पर खिलेगी,
उसे ढूँढ़कर लाने वाले आज के हनुमान कौन होंगे,
जो बुझती हुई उम्मीदों में फिर से रोशनी भरेंगे, वे इंसान कौन होंगे।

न गदा होगी हाथ में, न कोई मुकुट सिर पर होगा,
बस सच के लिए धड़कता हुआ उनका ज़मीर होगा,
जो गिरते हुए को देखकर अपना हाथ बढ़ा दे,
शायद वही आज का हनुमान, वही असली वीर होगा।

उन्हें पहचानेंगे कैसे… यही सबसे बड़ा सवाल है,
क्योंकि आज चेहरे पर मुखौटों का कमाल है,
जो अपने यश का ढिंढोरा न पीटे,
और परहित में चुपचाप जलता रहे… वही मशाल है।

जो सत्ता से नहीं, सत्य से डरता हो,
जो भीड़ में रहकर भी भीड़ से अलग चलता हो,
जिसके लिए इंसान पहले, मज़हब और जात बाद में हो,
जो टूटे हुए दिलों को जोड़ता हो… वही संजीवनी का रखवाला हो।

हो सकता है वह किसी गाँव की पगडंडी में मिले,
किसी माँ की दुआ में, किसी बच्चे की हँसी में मिले,
किसी अनजान के लिए अपना सुख छोड़ते हुए मिले,
और हमें देखकर नहीं… किसी ज़रूरतमंद को देखकर खिले।

हनुमान आज भी होंगे, बस रूप बदल गया होगा,
राम का नाम शायद अब कर्मों में ढल गया होगा,
संजीवनी किसी पहाड़ पर नहीं, इंसानियत में छिपी होगी,
जो उसे पहचान ले… समझो इस युग में वही हनुमान होगा।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

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