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रेत के शहर में

                
                                                         
                            रेत के शहर में समुंदर कहाँ तलाशूँ,
                                                                 
                            
कुछ तो याद होगा हम बिछड़े किस शहर से थे।

तेरी गली की धूप भी अब शरबत-सी लगती है,
यादों के आख़िरी मोड़ पर हम ठहरे किस शहर में थे।

दीवारें आज भी तेरे नाम की ख़ुशबू सँजोए हैं,
सोचता हूँ वो शामें बिखरी किस शहर से थी।

साहिल ने लाख चाहा कि दरिया को भूल जाए,
मगर लहरें बता रही हैं हम ठहरे किस शहर में थे।

अब तो नक्शे में भी मेरी खामोशी पढ़ नहीं पाते,
चलो दिल से पूछें आख़िर हम बिछड़े किस शहर से थे।

तेरा वजूद सलामत है मेरी सरफ़रोश हिमाकत से,
ये मैं कैसे कहूँ मैं सलामत हूँ तेरी उन्हीं निगाहों से |
-रतन कुमार कैथवास
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33 मिनट पहले

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