संजीदा शहर में ये रणथंभौर का किला क्या कहता है,
सदियों की खामोशी में कौन-सा किस्सा रहता है,
पत्थरों पर लिखी इबारत आज भी सवाल करती है…
जो झुकता नहीं किसी के आगे, वही असल में जिंदा रहता है।
ऊँची दीवारों से शायद इतना पैगाम आता है,
वक़्त किसी के हुक्म से कहाँ रुक पाता है,
सल्तनतें आती हैं, सल्तनतें चली जाती हैं,
मगर स्वाभिमान का परचम सदियों तक लहराता है।
इन बुर्जों ने न जाने कितने मौसम देखे हैं,
तलवारों के शोर और कितने मातम देखे हैं,
कभी जीत का जश्न, कभी हार की रातें देखीं,
फिर भी पत्थरों ने अपने इरादे नहीं बदले हैं।
किला पूछता होगा… तुम्हारे दौर की ताकत क्या है,
ऊँची इमारत या भीतर बची हुई हिम्मत क्या है,
हमने तो पत्थरों में भी अपना वजूद बचा लिया,
तुम बताओ… तुमने अपने भीतर क्या बचाया है?
रणथंभौर कहता है, ऊँचाई केवल दीवारों में नहीं,
असली किला इंसान के किरदार में कहीं,
समय कितना भी कठिन हो, सिर झुकाना मत,
इतिहास की असली जीत तलवार में नहीं… विचार में सही।
जो बीत गया, वह केवल कहानी नहीं, निशान है,
हर खंडहर के भीतर किसी युग की पहचान है,
किले तो टूट सकते हैं, पत्थर भी बिखर सकते हैं,
लेकिन जीवित रहे स्वाभिमान… तो वही सबसे बड़ी शान है।
इस संजीदा शहर में शायद यही संदेश देना चाहता है,
रणथंभौर आज भी चुप रहकर हमसे कुछ कहता है…
वक़्त बदलता रहे, दुनिया बदलती रहे,
जिसका ज़मीर जिंदा हो, उसका इतिहास जिंदा रहता है।
-रतन कुमार कैथवास
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