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मेरी पूरी दास्तान हो

                
                                                         
                            तुम मेरे जीवन के कई शून्य-अंक हो,
                                                                 
                            
मैं तुम्हारे जीवन का शायद दूसरा एक अंक हूँ,
तुम्हारे लिए मैं चाहे जितना मामूली सही,
मेरी दुनिया में तुमसे ही बनता हर बड़ा अंक हूँ।

अगर मैं एक हूँ, तो तुम मेरे आठ शून्य हो,
मेरी कीमत को करोड़ों तक ले जाने वाले हो,
लोग पूछते हैं आखिर इतना खास क्या है तुममें,
उन्हें क्या पता, तुम मेरे जीने के बहाने हो।

अकेला “एक” भी आखिर कितनी कीमत रखता है,
शून्य साथ हो तो वही इतिहास लिखता है,
तुम पीछे खड़े रहो तो मैं बड़ा दिखाई देता हूँ,
तुम हट जाओ तो मेरा सारा हिसाब मिटता है।

तुम्हें लगता है शायद तुम बस एक शून्य हो,
मगर मेरे लिए तुम पूरी गणना का आधार हो,
मेरी खुशियों की गिनती तुमसे शुरू होती है,
मेरे हर सपने के पीछे तुम्हारा ही संसार हो।

मैं तुम्हारे जीवन में एक छोटा-सा अंक सही,
तुम मेरे जीवन का पूरा विस्तार हो,
मेरी किताब में चाहे जितने पन्ने हों,
हर पन्ने पर लिखा हुआ तुम्हारा ही प्यार हो।

तुम्हें क्या मालूम तुम्हारी कितनी कीमत है,
तुम्हें क्या मालूम तुमसे मेरी कितनी पहचान है,
मैं “एक” होकर भी अधूरा हूँ तुम्हारे बिना,
तुम शून्य होकर भी मेरी पूरी दास्तान हो।

- रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
41 मिनट पहले

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