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मीत तुम्हारा मैं बहुत पुराना

                
                                                         
                            घर में सब को बोल दिया क्या,
                                                                 
                            
सपने अपने सींच रहे थे,
मन के उपवन फूल से भर दूँ,
विश्वास करो… कुछ ख्वाब सजे थे।

मीत तुम्हारा मैं बहुत पुराना,
राहों का हूँ जाना-पहचाना,
तुम चाहे जितना रूठ लो मुझसे,
मैंने फिर भी तुम्हें ही माना।

धूप मिली तो छाँव बना दूँ,
सूनी राहों में गाँव बना दूँ,
आँखों में जो नमी ठहर गई,
उस नमी को मैं नाव बना दूँ।

तुम बस अपना हाथ बढ़ाना,
हर मौसम में साथ निभाना,
टूटे मन के बिखरे किस्से,
बैठ तुम्हारे संग फिर गाना।

जो कुछ खोया, उसे न गिनना,
बीते कल के आँसू न चुनना,
आज अगर तुम साथ चलोगे,
कल को होगा पूरा सपना।

मन के दीपक जलते रहना,
मुझ पर थोड़ा विश्वास भी रखना,
दुनिया चाहे लाख कहे कुछ,
तुम मेरा बस नाम ही कहना।

मीत तुम्हारा मैं बहुत पुराना,
तुमसे ही है मेरा अफ़साना,
तुम चलोगी तो राह बनेगी,
तुम रुके तो रुकेगा ज़माना।

सपनों को फिर रंग लगाएँ,
सूखे मौसम गीत सुनाएँ,
तुम विश्वास करो बस इतना…
हम फिर अपना घर ये सजाएँ।

- रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 घंटे पहले

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