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माँगता था लहू मेरा

                
                                                         
                            जिसे समझा था मैंने उम्र भर का आशियाँ,
                                                                 
                            
वही तो निकला हवाओं में इक धुआँ मेरा।

मैं अपनी प्यास लिए दरिया-दरिया भटकता रहा,
कोई समझ न सका कितना था इम्तिहाँ मेरा।

वो एक शख़्स जिसे अपना साहिल समझा था,
उसी ने छीन लिया मुझसे आसमाँ मेरा।

मैं आँधियों से उलझता रहा चराग़ लिए,
मगर न बच सका बारिश में भी निशाँ मेरा।

बहुत करीब था मंज़िल का रास्ता शायद,
मगर हर एक क़दम माँगता था लहू मेरा।

मैं डूबकर भी समंदर से हारता कैसे,
मेरी ही साँस में ज़िंदा था इक जुनून मेरा।
-रतन कुमार कैथवास
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34 मिनट पहले

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