कितना सब्र करें हम अब,
जब आगे सारा शून्य दिख रहा,
मन भक्ति में लीन न होता,
लगता है कैलाश चलें क्या?
राह-डगर में भोले मिल गए,
बोले… आ जा काशी में अब तू,
दो-चार दिन गंगा घाट पे बैठ,
मन तेरा शांत हो ही जाएगा |
अभी बहुत उद्विग्न है तेरा मन,
हर बात में क्यों उलझा रहता है,
जो होना है, होकर रहेगा,
तू क्यों हर पल डरता रहता है?
जिसको अपना समझकर बैठा,
वही अगर पराया निकले तो क्या,
जिस राह पर फूल न मिलें,
उस राह से लौट जाना भी क्या?
मैंने पूछा… “भोले, मन माने कैसे,
हर तरफ़ अँधेरा छाया है,
जिसे सँवारने में उम्र लगा दी,
वही सब कुछ बिखरता आया है।”
भोले हँसे और बोले…
“तूने जीवन को बहुत हिसाबों में बाँट दिया,
जो मिला उसे, कम समझा,
जो नहीं मिला उसे अपना ख्वाब बना लिया।”
“चल, पहले गंगा के पास बैठ,
अपने भीतर का शोर बहा दे,
जो बोझ वर्षों से ढोता आया,
आज उसे मेरे हवाले कर दे।”
फिर बोले… “कैलाश दूर नहीं है,
पहले मन में थोड़ा काशी कर ले,
बाहर मंदिर ढूँढ़ने से पहले,
अपने भीतर एक दीप जला ले।
मैं चुप था, बस सुनता रहा,
गंगा धीरे-धीरे बहती रही,
लहरों ने जैसे इतना कहा…
“जिसे तू अंत समझ रहा है,
वहीं से नई राह निकलती है।”
- रतन कुमार कैथवास
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