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कुर्बत के चार दिन

                
                                                         
                            हँसते रहे, तो दर्द का एहसास भी न था,
                                                                 
                            
यूँ कट गए ख़ुशी से मुसीबत में चार दिन।

कल तक जो अजनबी थे, वो अपने से हो गए,
क्या रंग ले के आए थे क़िस्मत में चार दिन।

न शिकवा था, न कोई गिला, न कोई फ़ासला,
बस प्यार ही मिला हमें चाहत में चार दिन।

अब फिर वही सफ़र है, वही रोज़गार की धूप,
लेकिन महक रहे हैं वो राहत के चार दिन।

मुमकिन है फिर कभी न मिलें इस तरह मगर,
दिल में रहेंगे यारों की क़ुर्बत के चार दिन।
-रतन कुमार कैथवास
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37 मिनट पहले

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