मैंने हर मोड़ पे ख़ुद अपना ही साया देखा,
कोई मिलता ही नहीं था यहाँ यादों के बग़ैर।
जिसको मंज़िल का गुमाँ था वो छलावा निकला,
दूर तक कोई नज़र आया न राहत के बग़ैर।
प्यास इतनी थी कि दरिया भी मुझे कम लगता था,
और ये वीराना भी न छोड़ा मैंने हिम्मत के बग़ैर।
लोग कहते थे कि लौटो, यहाँ कुछ भी नहीं है,
मैं चला आया था बस अपने जुनूँ की ख़ातिर।
अब हवा पूछती है मुझसे कि बताओ राही,
कौन आता है भला इस वीराने में चाहत के बग़ैर।
मैंने हँसकर कहा… ये रेत ही मंज़िल है मेरी,
कौन जीता है यहाँ ख़्वाब की कीमत के बग़ैर।
-रतन कुमार कैथवास
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