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काँटों का इम्तिहान

                
                                                         
                            हिकारत भरी नज़रों से क्यों देखते हो,
                                                                 
                            
क्या समझ रखा है… हम बनफूल हैं?
हम भी अपनी पहचान लेकर खड़े हैं,
हम नेवला नहीं, फूलों के पहरेदार काँटे हैं।

तुम्हें खुशबू दिखी, हमें ज़ख्म दिखे,
तुम्हें रंग दिखे, हमें मौसम दिखे,
जिस बाग़ की तुम तारीफ़ करते हो,
उसी की हिफ़ाज़त में हम रात-दिन डटे रहते हैं।

हमारी चुभन को कमजोरी न समझना,
हमारी खामोशी को मजबूरी न समझना,
जो हाथ फूलों तक पहुँचते हैं गलत इरादे से,
उन्हीं हाथों के लिए हम दीवार बने खड़े हैं।

हम पर पत्थर फेंको, हम सह लेंगे,
तुम जितना झुकाओगे, हम उतना सह लेंगे,
मगर फूलों की इज़्ज़त पर आँच आई तो…
हम अपने काँटों से तूफ़ान लिखने खड़े हैं।

हिकारत से देखना है तो देखते रहो,
हमारे वजूद को कमतर कहते रहो,
याद रखना… बाग़ सिर्फ फूलों से नहीं सजता,
कुछ काँटे भी होते हैं, जो उन्हें उजड़ने से बचाते हैं |
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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