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कहीं सिद्धार्थ ना बन जाऊँ

                
                                                         
                            क्यों रेखाओं को लंबी खींचती जा रही हो,
                                                                 
                            
नहीं मिलना है तो साफ़ मना कर दो,
इसी आपाधापी में कहीं मौसम बदल न जाए,
जज़्बात बदल न जाएँ, कुछ तो सोचा करो।

कुछ तो सोचो मेरा क्या होगा,
कहीं सिद्धार्थ न बन जाऊँ,
तुम्हारी एक झलक के इंतज़ार में,
कहीं खुद से ही दूर न हो जाऊँ।

तुम कहती हो अभी वक्त नहीं आया,
मैं कहता हूँ वक्त को यूँ मत टालो,
जो बात दिल में है, कह दो आज ही,
कल के भरोसे रिश्तों को मत टालो।

ये दूरी भी कोई उम्र भर की सज़ा है क्या,
हर सवाल का जवाब ख़ामोशी है क्या?
मैं रोज़ तुम्हारे दर तक आता हूँ,
बताओ, लौट जाना ही मेरी तक़दीर है क्या?

मौसम की फ़ितरत है बदल जाना,
फिर दिल को भी कहाँ समझाना आसान होगा,
आज जो धड़कन तुम्हारे नाम है,
कल शायद उसका कोई और ठिकाना होगा।

इसलिए रेखाएँ छोटी कर दो,
या फिर अपना फ़ैसला सुना दो,
मिलना है तो एक कदम तुम बढ़ा दो,
नहीं मिलना…
तो मुझे सिद्धार्थ बनने का रास्ता ही दिखा दो।

- रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

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