शीश झुकाकर जिनको पूजा,
वो भी हवा-हवाई निकले,
बातें उनकी भर-भर बोरी,
लेकिन ज़ुबान के कच्चे निकले।
मंचों पर आदर्श सुनाते,
घर में अपने झूठे निकले,
चेहरे पर सादगी का पहरा,
पीछे से सारे लुटेरे निकले।
मीठी-मीठी बातें करके,
दिल के सौदे करने निकले,
हमने जिनको अपना समझा,
वो तो मतलब के अपने निकले।
वादे उनके आसमान छूते,
कदम ज़मीन पर टिक न सके,
दुनिया जीतने निकले थे जो,
अपने घर में ही हार गए।
सच की बातें खूब कहीं,
लेकिन सच से डरते निकले,
आईना जब सामने आया,
खुद ही नज़रें फेरते निकले।
हमने समझा दीपक होंगे,
लेकिन धुआँ-धुआँ से निकले,
जिनको माना राह दिखाने वाला,
वो खुद राह के भटके निकले।
अब न माथा हर चौखट पर,
न हर चेहरे पर विश्वास करेंगे,
जो कर्मों में खरे उतरेंगे,
बस उनको ही अपना कहेंगे।
- रतन कुमार कैथवास
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