हर मोड़ पर उम्मीद का मौसम मिला मगर,
पास आए तो धूप ही धूप दिखाई दिया।
जिसको समझ के हमने किनारा पकड़ लिया,
वो भी हमें डूबता हुआ रास्ता दिखाई दिया।
आँखों में एक ख़्वाब था, होंठों पे रूहानी प्यास,
क्या खूब था कि दर्द भी अपना दिखाई दिया।
चलते रहे तो राह ने धोखा दिया हमें,
रुक गये तो सफ़र कोई सच्चा दिखाई दिया।
मंज़िल की जुस्तजू में ये आलम रहा 'रतन',
हर शख़्स दूर से हमें अपना दिखाई दिया।
-रतन कुमार कैथवास
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