मैं उनका भी शुक्रगुज़ार हूँ, जिन्होंने हौसला दिया,
जब दिल बैठा जा रहा था, तब मुझे रास्ता दिया।
कुछ सूझता न था, न कोई राह नज़र आती थी,
किसी ने हाथों में अंगार रखकर आईना दिखा दिया।
पहले छटपटाया मैं, उस आग की तपिश से मगर,
उसी जलन ने मेरे भीतर का आदमी जगा दिया।
जो होश खो रहा था, वही होश में लौट आया,
बिखरे हुए ख़यालों को फिर से सिलसिला दिया।
अब दिमाग़ भी साफ़ है, निगाहों में नई रोशनी है,
जिसने मुझे तोड़ा था, उसी ने मुझे बना दिया।
मैं कैसे भूल जाऊँ उन हाथों का एहसान,
जिन्होंने बुझते हुए मुझमें फिर से अंगार लहका दिया।
-रतन कुमार कैथवास
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