तूने मेरी प्यास को समझा, मेरी ख़ामोशी भी पढ़ी,
तेरे हर ज़र्रे से अब तक मेरी एक ख़ुमारी है।
शहर में सब लोग मिलेंगे, कोई अपना कम ही होगा,
तेरी वीरानी में लेकिन एक अजब दिलदारी है।
मैंने तुझमें हार के भी ख़ुद को जीतते देखा है,
रेत पे चलते रहने की आदत भी तो प्यारी है।
लोग समझते हैं कि सहरा सिर्फ़ उजाड़ों का घर है,
हमसे पूछो… इस वीराने में कितनी रंगीनियाँ सारी हैं।
कल अगर दरिया भी मिल जाए तो शायद लौट आएँगे,
फिर भी तुझसे जो बनी है, वो कहाँ टूटेगी यारी है।
कौन कहता है कि रिश्ते सिर्फ़ इंसानों से होते हैं,
मेरे हिस्से में तो सहरा भी एक पुराना यार है।
-रतन कुमार कैथवास
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