धुआँ-धुआँ सा सफ़र है, रास्ते कोहरे से ढके,
किस ओर ले जाएँ कदम, जब सारे निशाँ हों धुँधले।
संभालूँ मैं कैसे खुद को, अधीर हो चला है दिल,
अँखियों से बहते नीर को, समझाऊँ मैं कैसे हर पल।
मैंने दिल से कहा… थोड़ा ठहर, अभी राह बाकी है,
दिल बोला… जिसकी आस लगी, वही तो सबसे ज़रूरी है।
मैंने आँखों से कहा… यूँ बरसना छोड़ दो आज,
आँखें बोलीं… दर्द छुपाना भी कहाँ हमारे बस की बात।
कोहरे ने राह रोकी तो मैंने कदम रोक लिए,
कुछ पुराने ख्वाब थे, उन्हें भी सीने से जोड़ लिए।
रास्ता दिखाई न दिया तो आसमान को देखने लगा,
एक तारे की उम्मीद में, अँधेरा भी सहने लगा।
कभी-कभी सफ़र में मंज़िल दिखाई नहीं देती,
मगर इसका मतलब ये नहीं कि राह कहीं होती नहीं।
धुंध चाहे जितनी हो, सूरज निकलता जरूर है,
जो टूटकर भी चलता रहे, वही मुसाफ़िर मशहूर है।
अँखियों का नीर भी शायद कोई संदेशा लाया है,
दिल ने जिसे छुपाया था, आँखों ने उसे बताया है।
बहने दो इन आँसुओं को, इन्हें बेकार मत समझना,
कभी-कभी आँखों का पानी ही दिल को रखता है ज़िंदा।
आज कोहरा है तो कल धूप भी खिल जाएगी,
आज सूनी राह है तो कल कोई आवाज़ बुलाएगी।
अधीर दिल को बस इतना समझा देना तुम,
सफ़र चाहे धुआँ-धुआँ हो… कदमों को चलते रहने देना तुम।
जब धुंध छँटेगी तो रास्ते साफ़ नज़र आएँगे,
जो खो गए हैं दूर कहीं, शायद फिर लौट आएँगे।
तब तक नीर को बहने दो, दिल को थोड़ा रो लेने दो,
मंज़िल देर से मिले अगर… तो सफ़र को भी कुछ कहने दो।
-रतन कुमार कैथवास
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