आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

दर्द की कोई दवा न दे

                
                                                         
                            मुझे छोड़ दे मेरे हाल पर, मेरी ख़ामोशी को सदा न दे,
                                                                 
                            
जो बुझा चुका है चराग़ दिल, उसे फिर से कोई हवा न दे।

मैंने मान ली है ये हार भी, मुझे जीतने का गुमाँ न दे,
मेरे ज़ख़्म अब भी हैं अज़ीज़, मुझे दर्द की कोई दवा न दे।

तेरी याद ही तो है पास अब, इसे मुझसे कोई जुदा कर न दे,
मैं इसी में अपना जहान रखूँ, मुझे इससे बढ़कर ख़ुदा कुछ न दे।

तू अगर मेरा नहीं हो सका, तो मुझे अपना कह के सज़ा न दे,
मेरी प्यास को समझ ज़रा, मुझे सामने ला के प्यासा कर न दे।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
37 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर