सलीब पर टाँग ना दिया जाऊँ,
यही डर का जो खौफ़ है,
कई हाथों को रोक देता है,
जब सामने कोई गलत रास्ता मौजूद हो।
कहीं सच की कीमत न चुकानी पड़े,
कहीं झूठ का पर्दाफाश न हो जाए,
इसी डर से आदमी सोचता है,
कि कोई गलत कदम उठाने से पहले
उसका अंजाम भी सामने आए।
डर हमेशा कमजोरी नहीं होता,
कभी-कभी यही पहरेदार होता है,
अंधेरे में बढ़ते कदमों के आगे,
अंतरात्मा का एक इशारा होता है।
कानून का डर हो, समाज का डर हो,
या अपने कर्मों का हिसाब हो,
गलत करने वाले के भीतर भी,
कहीं न कहीं सही होने का ख्वाब हो।
जिसे सज़ा का भय रहता है,
वह अपराध से थोड़ा दूर रहता है,
और जिसे किसी अंजाम का डर नहीं,
वही अक्सर हदों को पार करता है।
पर डर इतना भी मत पाल लेना,
कि सच कहने से घबरा जाओ,
अन्याय देखकर चुप रहो और,
अपने ही ज़मीर से नज़र चुरा जाओ।
खौफ़ अगर गलत को रोकता है,
तो हिम्मत सही को बचाती है,
एक बुराई को रोकने की ताकत,
सौ अच्छाइयों को राह दिखाती है।
सलीब का डर इतना हो कि,
हाथ किसी मासूम पर न उठे,
अंजाम का खौफ़ इतना हो कि,
कदम किसी गलत राह पर न मुड़े।
डर को अपना मालिक मत बनाओ,
उसे बस एक पहरेदार रहने दो,
ज़मीर की आवाज़ सबसे ऊपर रखो,
और इंसानियत को दिल में बहने दो।
कर्मों का हिसाब जब सामने आए,
तब कोई बहाना काम न आए,
इसलिए आज ही ऐसा जीवन जियो,
कि कल अपने कर्मों पर शर्म न आए।
खौफ़ अगर बुराई को रोक सके,
तो उसका होना भी बेकार नहीं,
लेकिन इंसान वही महान है,
जो डर से नहीं…
ज़मीर से गलत काम करता नहीं।
- रतन कुमार कैथवास
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