स्याही में अंगार न भर तू, अभी रात बहुत है,
पत्थर में रंग भरने वालों की बात बहुत है।
कब से हमको बेबाक़ न कर दें ये हवाएँ,
सीने में दबे ख़्वाबों की सौग़ात बहुत है।
कुछ मन के उपवन में हरसिंगार-सा खिलना है,
सूखे हुए मौसम में भी बरसात बहुत है।
तू धूप समझकर मेरी छाँव को कम मत आँक,
मेरी ख़ामोशियों में भी मुलाक़ात बहुत है।
पत्थरों से कहो दिल की ज़ुबाँ समझे ज़रा,
हर चोट के पीछे कोई जज़्बात बहुत है।
जो रंग अभी आँखों में ठहरा हुआ है मेरे,
उस रंग को बचाना भी इक बात बहुत है।
हम राख हुए तो, फिर उजाला ही करेंगे,
इस मुट्ठी में अब भी, कोई अंगार बहुत है।
-रतन कुमार कैथवास
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