जग सँवारने से पहले मन सँवार लो तुम,
फिर नदी की तीव्र धारा को तुम शीघ्र घुमा सकोगे,
जलप्रपातों पर कई बाँध बनवाने पड़ेंगे,
तब कहीं जाकर के ज्यादा बिजली बना सकोगे।
पहले भीतर की अँधेरी सुरंगों में दीप जलाओ,
फिर दुनिया के हर अँधेरे को तुम दूर भगा सकोगे,
अपने भीतर के तूफ़ानों पर काबू कर पाना सीखो,
फिर समंदर की लहरों को भी राह दिखा सकोगे।
सिर्फ़ ऊँची इमारतों से शहर नहीं सँवरता,
नींव में ईमान की मिट्टी भी तुमको मिलानी होगी,
सड़कों पर कानून लिख देने से व्यवस्था नहीं आती,
लोगों के भीतर भी एक अदालत तुम्हें सजानी होगी।
लोभ की नदियों पर पहले बाँध बनाना होगा,
तृष्णा की बाढ़ को भी सीमाओं में लाना होगा,
जब मन का जल संयम की धारा में बहने लगेगा,
तब जीवन का हर किनारा खुद सँवरने लगेगा।
शब्द बहुत हैं, मगर आचरण कम दिखाई देता है,
हर चेहरा आईना है, मगर चेहरा नम दिखाई देता है,
दूसरों को बदलने की सलाह देने से पहले,
अपने भीतर झाँकना भी तो जरूरी दिखाई देता है।
एक मन सुधरेगा तो घर का मौसम बदल जाएगा,
एक घर सुधरेगा तो पूरा आँगन बदल जाएगा,
आँगन से निकली रोशनी जब गलियों तक पहुँचेगी,
देखना, धीरे-धीरे पूरा शहर बदल जाएगा।
फिर शिक्षा की नदियाँ खेतों तक पहुँचेंगी,
मेहनत की फसलें हर मौसम में लहराएँगी,
बच्चों की आँखों में जब सपने सुरक्षित होंगे,
तब आने वाली पीढ़ियाँ इतिहास नया बनाएँगी।
इसलिए जग को बदलने की जल्दी मत करो,
पहले अपने मन की गाँठों को खोलो तुम,
जिस दिन भीतर का इंसान जागकर चल देगा,
उस दिन दुनिया बदलने को नहीं…
तुम्हारे साथ चलने को मन से तैयार होगी।
- रतन कुमार कैथवास
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