गंगा बहानी हो अगर हिमालय से,
पहले अपने भीतर गंगा बहाई जाए।
मैला है अगर मन का कोई कोना,
पहले उस पर निर्मलता लाई जाए।
दुनिया को देने चले हैं हम उपदेश,
पहले खुद से अपनी बात कही जाए।
औरों के दोष गिनाने से पहले,
अपने भीतर की धूल हटाई जाए।
नफरत के पत्थर बहुत हैं राहों में,
प्रेम की कोई धारा बहाई जाए।
जो टूट रहे हैं किनारे बस्तियों के,
उन पर विश्वास की नाव चलाई जाए।
शब्दों में ही क्यों रह जाए करुणा,
आँखों से भी दया छलकाई जाए।
जिसे देखकर हम मुँह फेर लेते हैं,
उसकी पीड़ा भी अपनी बनाई जाए।
गंगा केवल नदी नहीं होती,
एक सोच हृदय में बसाई जाए।
धरती को माँ कहने से पहले,
माँ की गोद भी तो बचाया जाए।
हिमालय से गंगा उतरेगी तभी,
जब भीतर बर्फ पिघलाई जाए।
बाहर की दुनिया बदलने से पहले,
खुद में थोड़ी दुनिया बदली जाए।
अगर सचमुच गंगा बहानी है,
तो पहले आत्मा निर्मल बनाई जाए।
देश, समाज और जगत सँवारने से पहले,
इंसानियत भी अपने भीतर जगाई जाए।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X