दिन निकलने का संदेशा रात ने क्यों दे दिया है,
स्याह रातें थीं बेखबर, कि अब सहर होने को है,
अब शहर में आ भी जाओ, ठहर के सुबह चाय पिएँगे हम,
बहुत दिनों से मन में ठहरी, एक मुलाक़ात होने को है।
खिड़की पर आकर हवा ने भी,
धीरे से दस्तक दे दी है,
सूनी गलियों ने जाने क्यों,
आज तेरी आहट सुन ली है,
रात की चुप्पी टूट रही है,
कुछ तो नया होने को है।
चाँद ने बादल की ओट से,
आधी-सी मुस्कान दिखाई है,
तारों ने भी झुककर जैसे,
सुबह की खबर सुनाई है,
लगता है इन ठंडी राहों पर,
फिर कोई कारवाँ आने को है।
तुम आओगे तो आँगन में,
धूप बिछा देंगे हम,
पुरानी पीतल की केतली में,
चाय चढ़ा देंगे हम,
तुम अपनी सारी बातें कहना,
हम बस सुनते रहेंगे…
कितने मौसम के बाद आखिर,
ऐसा सिलसिला होने को है।
न शिकायत की बात करेंगे,
न बीते कल का हिसाब होगा,
तुम्हारी आँखों में जो ठहरा,
वही हमारा जवाब होगा,
दो कप चाय के बीच कहीं फिर,
वो पुराना अपनापन होगा।
शहर बहुत व्यस्त रहा है,
लोग बहुत जल्दी में हैं,
हम भी कब तक दौड़ेंगे यूँ,
अपने ही साए के पीछे हैं,
चलो किसी सुबह को थामें,
जब जीना आसान होने को है।
दिन निकलने का संदेशा,
अब हवाएँ रोज़ देंगी,
स्याह रातों की हथेली पर,
सूरज की किरणें लिखेंगी,
तुम बस शहर में आ जाओ…
बाकी हम देख लेंगे,
सुबह की चाय के बहाने
फिर से कुछ ख़्वाब जिएँगे।
- रतन कुमार कैथवास
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