लोग छूते हैं जहाँ ऊँचाइयों के शिखर,
उसने गिरकर दिखाई पतन की हदें।
चेकपोस्ट पर वर्दी का उड़ाया मज़ाक़,
तोड़े सुरक्षा-नियम, भूल गई सब अदबें।
टैक्स भरने का झूठा वो रौब भी दिखाया,
मनगढ़ंत बातों का एक जाल फैलाया।
'Gen Z' का बड़बोलापन, कैसी ये नादानी,
अब कैमरे पे गढ़ती है माफ़ी की कहानी।
पहले तो ज़हर जमकर ज़ुबाँ से उगला,
अब पश्चाताप का ये ढोंग भी रचाया।
ये शर्म नहीं, बस क़ानून का डर सताया है,
हेकड़ी उतरी तो ‘विक्टिम कार्ड’ आज़माया है।
हर तरफ़ इस बदज़ुबानी पे थू-थू हो रही,
बचने को अब लाचारी की दुहाई दी जा रही।
सरहद पे जो पहरा है, वही देश की है शान,
इन ड्रामेबाज़ चेहरों की क्या बिसात, क्या पहचान!
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