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समझ इतना नहीं आता

                
                                                         
                            बड़ा मुश्किल पहाड़ा है,समझ इतना नहीं आता।
                                                                 
                            
ये दुनिया है ?अखाड़ा है?समझ इतना नहीं आता।।
ख़फ़ा हैं लोग मुझसे क्योंकि आखिरकार क्या मैंने,
किसी का क्या बिगाड़ा है?समझ इतना नहीं आता ।
अगरचे दुश्मनी थी ,बागबाँ से ,आपकी साहिब,
चमन को क्यों उजाड़ा है? समझ इतना नहीं आता ।
पहनकर लोग जैकेट,कोट, जूते,टोप और मफलर,
कहेंगे आज जाड़ा है,समझ इतना नहीं आता ।।
दुलारा था जिसे माँ बाप ने ताउम्र, जब रामू,
उसी ने क्यों लताड़ा है?समझ इतना नहीं आता ।।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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