जिस दिन
यह धरती पूरी की पूरी
धूल बनने की तैयारी में
बिखर बिखर जाएगी
जिस दिन
इस धरती की कोख से
सभी हीरक- रत्न
बाहर निकाल लिए जाएंगे
जिस दिन
ताल में तैरता हुआ हंस
केवल पानी खोजने लगेगा
उस दिन तक
मैं जीवित रह कर भला क्या करूंगा?
हरित- मंडप सी मेरी
यह धरित्री
आज भी इतनी वृक्ष- वल्लरियाँ
ढके हुए हैं मुझे
लगता है जैसे
मेरे जीवन का नित्य प्रतिदिन
मेरे विवाहोत्सव का ही दिन है...
पर पतझड़ में,
ऐसा भी होता है
जब सभी
पेड़ अपनी पत्तियाँ गिरा जाते हैं
तब मुझे
ना जाने कैसा कुछ लगने लगता है
तब जरूर लगता है
मेरी यह सांस
मेरे पिंजर में नहीं घुस पा रही है
हाथ- पैर कांपने लगते हैं
मित्र!
तुम विज्ञान वाले हो
तुमने पकड़ रखे हैं-
तुम्हारे पास मौजूद हैं
बहुत सारी दवाइयां
और हड्डी तक भेदने वाले एक्सरे
तुम लोग कोई रोग
दमा- अस्थमा का नाम बताओगे
दवाइयों की बड़ी थैली पकड़ा जाओगे
और कुछ नहीं होगा
तब नींद वाली बाघिन गोली से
मुझे सुला ही दोगे
(इतना तो कर ही सकते हो)
पर सच बता रहा हूं प्रिय,
सच!
थोड़े ही दिन बाद
ये शिरीष के शोर मचाने वाले बड़बोले पेड़
ना जाने कहां से ले आते हैं
हरे- पीले सुगंधित फूलों की झालर
तब तो फिर
गर्मी के दिनों की चाबुक की मार भी
नहीं लगती
चाबुक के चिन्ह
इन खुशबूदार फूलों की
मलहम से मिट जाते हैं
सुनसान दोपहरी भी
मुझ अकेले को
बड़ी सुहानी लगती है
जी ठंडा हो जाता है ।
मैं जानता हूं मुझे भर नहीं
तुम्हें भी
ठीक है ऐसा ही लगता है
फर्क बस इतना कि इस बात को
मैं बता सकता हूं सबको
और तुम उसे खपा सकते हो
अपनी दुनियादारी में।
उसी ब्रह्मा ने मुझे बनाया है
जिसने तुम्हें बनाया
उसी धूल- मिट्टी से
वही पंच रतन खोल
ढंके हुए हैं मेरे -तुम्हारे चोले को
तब मुझे
जैसे लगता है
कैसे नहीं लगता होगा तुम्हें ?
-रामनाथ साहू
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