जहाँ न पहुँची थी कोई राह कभी,
अब वहाँ रेल ने बाँधी डोर नयी।
घाटी, पहाड़, घने वन पार कर,
भारत की साँसें चलने लगीं हर तरफ़ एकसार कर।
आइज़ोल की सुबह अब सीटी से जागे,
हर दुर्गम कोना सफ़र के गीत गाए।
अब कोई छोर न बिछुड़ा रहेगा,
पूर्वोत्तर भी अब पास रहेगा।
गुवाहाटी से लेकर ईटानगर तलक,
अब रुकता नहीं भारत का हरक।
रेल की लय में बसा है विकास,
जैसे जीवन में लौटी हो नई साँस।
नदियाँ जो चुप थीं, अब सुर में बहतीं,
पहाड़ जो दूर थे, अब पास लगतीं।
धरती की चादर में पटरी सिली गई,
सपनों की गाड़ी हर गाँव में चली गई।
चटगाँव की लहरों से मिलती ज़मीं,
आर्थिक उफान में बहती अब छाँव-सी नमीं।
सितवे बंदरगाह, कोलकाता का संग,
पूर्वोत्तर को मिला समुंदर का अंग।
बैराबी से सेरंग की रेल कह रही,
अब मिज़ोरम भी दुनिया से जुड़ रही।
जिरीबाम, इंफाल, रंगपो के रस्ते,
अब संकल्पों से सज रहे हैं बस्ते।
नगालैंड की सुबह हो या मणिपुर का पहर,
हर राज्य बोले – ‘अब हम भी हैं सफ़र में अगर।’
रेल नहीं, ये है रिश्तों की रेखा,
भारत की आत्मा से जुड़ता हर एक देखा।
जम्मू के दिल में बसी जो सुरंग है,
पीर पंजाल की वो चुप्पी अब संग है।
चिनाब पर बना पुल कहे गरज के साथ,
“सीमा नहीं अब दूरी की बात।”
श्रीनगर से कारगिल फिर लेह तक जो डगर,
वो है पराक्रम की, सुरक्षा की उमर।
भानुपल्ली-बिलासपुर की बाँहों में बसा,
हिमाचल से होता लेह का पता।
डल झील का नाविक कहे सच्चा कथन,
"हवाई से नहीं, ट्रेन से बढ़े पर्यटन।"
क्योंकि रेल लाती है जन की बयार,
हर गरीब को देती है सफ़र का उपहार।
उत्तराखंड भी अब रेल से जुड़ने चला,
जहाँ बद्री-केदार का पथ सवेरा बना।
ऋषिकेश से देवप्रयाग, फिर केदारनाथ,
रेल से होगा हर तीर्थ का साथ।
विद्युतीकरण के सौ वर्ष हुए पूरे,
सपने नहीं, अब हैं बिजली के सूरे।
हर इंजन चले बिना धुएँ के अब,
देश बोले – "ये है नवयुग का स्वर!"
हर स्टेशन पर हरियाली की छाया,
हर पटरियों में बचपन की माया।
अक्षय ऊर्जा से दौड़ती रेल कहे,
“अब शून्य उत्सर्जन की ओर बढ़े।”
जहां पटरी गई, वहाँ भारत जुड़ा,
हर कोना अब सपनों से बुनता धरा।
न सीमा रही, न दूरी रही,
रेल से चलती अब उम्मीद सही।
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